Saturday, December 29, 2012

दामिनी इस नपुंसक व्यवस्था के कफ़न में आखिरी कील साबित हो !

Saturday, October 27, 2012

राष्ट्रदामाद का पद

# राष्ट्रपिता, राष्ट्रपति के बाद अब राष्ट्रदामाद का पद भी सृजित किया जाना चाहिए .
* हमारा देश अंग्रेजों ने भी इतना न लूटा होगा जितना चोर चोर मोसेरे भाइयों ने लूटा है .

Wednesday, October 17, 2012

आखिर इस देश का मालिक कौन है ?

देश में कानून का दिवाला पिट गया लगता है.
देश का कानून मंत्री भी गुंडों की तरह धमकियां देने लगा है .
फिर भी मोहन मौन है .
आखिर इस देश का मालिक कौन है ?
कुर्सी पाने व बचाने के चक्कर में दामादों को देश लुटा रहे हैं.

Friday, October 12, 2012

शादी किस उम्र में होनी चाहिए

*शादी किस उम्र में होनी चाहिए,
कौन तय करेगा -
खाप, चौटाला या सरकार ?
परिवार को ही तय करने दो न !

Sunday, October 7, 2012

* अब आम आदमी भी टोपी पहनने लगा है .

Saturday, October 6, 2012


जागो~ ~ जागो ~ ~
~मोहन~ प्यारे ~ ~
50 से 3000 कैसे बनाये
कोई हमें भी तो समझाये
# यह दामाद किस किस का है ?
* एक ईमानदार को ढाल बनाकर अनेक बेईमान इस देश को लूट रहे हैं .
ईमानदार में नैतिकता तो होती होगी ?

Tuesday, August 28, 2012

वस्त्रहीन होना अगर अश्लीलता है तो

वस्त्रहीन होना अगर अश्लीलता है तो
१. जैन समाज में इसे किस रूप में देखा जाता है ?
२. नागाओं की वस्त्रहीनता को क्या कहा जाएगा ?

प्रतिबन्ध हमें मंजूर नहीं .

प्रतिबन्ध हमें मंजूर नहीं .
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किसी भी तरह की आज़ादी पर पाबंदी नहीं होनी चाहिए .
अफवाहों का प्रतिकार किया जाना चाहिए .
अफवाह फ़ैलाने वाले स्वयं अपनी विश्वसनीयता खो देंगे .
हाँ, सोशल मीडिया में फेक आईडी कायम न हो, इसके लिए ज़रुरी प्रबंध हों .
"बेटी बचाओ"
यह नारा आज आम है .
बेटों के बारे में क्या विचार है ?

Friday, August 24, 2012

काला धन
नहीं नहीं
कोयला धन

Thursday, August 23, 2012

* अन्धविश्वास अपनाना अपनी सोच के कदमों को रोकना है .
इस देश को कौन चला रहा है,
कोई हमें भी तो बताये.
या हमें यह जानने का अधिकार ही नहीं है .
काश !
मायावती ने जो पैसा मूर्तियों में लगाया,
वह गरीबों को रोजगार देने में लगाया होता .

Wednesday, August 22, 2012

सदन को जो चलाना चाहे, कहीं से भी चलाए.
पर माईक को तो बंद कर दिया करो मेरे भाए.

Tuesday, August 21, 2012

* ईमानदार व्यक्ति को किसी के प्रमाणपत्र की आवश्यकता नहीं होती .
#    इंसान होना, अल्पसंख्यक है क्या ?
* ईमानदार व्यक्ति को कष्ट झेलने के लिए सदैव तैयार रहना चाहिए .
* व्यक्ति की असली पहचान उसके कर्मों से होती है, दिखावे से नहीं .

Wednesday, August 8, 2012

दाल, सब्जी नहीं खायी जाती, 
घर पे नहीं बना सकते, 
कोई बात नहीं मोबाइल लीजिये, 
फ़ोन कीजिये, होटल से मंगा के खाईये, 
हो गयी न गरीबी दूर .

Tuesday, August 7, 2012

क्या लोक संसद ही व्यवस्था परिवर्तन है ? -- बजरंग मुनि

क्या लोक संसद ही व्यवस्था परिवर्तन है ?                                                            ------ बजरंग मुनि 

              आज भी भारत में बहुत लोग ऐसे हैं जो रामराज्य के समर्थक हैं। गांधी जी भी रामराज्य को आदर्श स्थिति मानते थे। रामराज्य का अर्थ है सुराज्य अर्थात अच्छे व्यक्ति का शासन। प्रश्न उठता है कि राम के काल में सुशासन था तो रावण का कुशासन भी तो राम के ही कालखण्ड में था। तो क्या उस समय सुशासन या कुशासन राजा की इच्छा पर निर्भर करता था तथा जनता की उसमें कोई भूमिका नहीं थी? क्या राजा पूर्ण तानाशाह था? और यदि वास्तव मे राम के काल मे ऐसा ही था तो हमे ऐसा राम राज्य नही चाहिये। चाहे ऐसे रामराज्य की प्रशंसा गांधी करे या अन्ना हजारे।
              व्यवस्था तीन प्रकार की होती है (1) राजतंत्र या तानाशाही (2) लोकतंत्र (3) लोक स्वराज्य। तानाशाही में शासन का संविधान होता है। लोकतंत्र में संविधान का शासन होता है किन्तु संविधान निर्माण में लोक और तंत्र की मिली जुली भूमिका होती है। लोक स्वराज्य में लोक द्वारा निर्मित संविधान का शासन होता है। पश्चिम के देशों में लोक स्वराज्य की दिशा में झुका हुआ लोकतंत्र है तो भारत आदि देशों में तानाशाही की दिशा में झुका हुआ। पश्चिम के देशों में संविधान का शासन है किन्तु संविधान निर्माण या संशोधन में लोक और तंत्र की मिली जुली भूमिका होती है। भारत में संविधान निर्माण या संशोधन में जनता की कोई भूमिका नहीं होती। तंत्र के तीन अंग होते हैं जो शासक माने जाते हैं। यही तीनों संविधान बनाते भी हैं और संशोधित भी करते हैं। संविधान निर्माण या संशोधन में लोक की कोई भूमिका नहीं होती। शासन के इन तीन अंगों में से भी संविधान लगभग संसद के ही अधीन होता है। संसद जब चाहे उसमें संशोधन कर सकती है जिसमें अन्य दो अंग यदा कदा ही दखल दे सकते हैं। जनता की तो संविधान संशोधन में कोई भूमिका कभी हो सकती ही नहीं।
              राम राज में राजा की व्यवस्था होती थी तथा लोकतंत्र में व्यवस्था के अन्तर्गत राज्य चलता है। उस समय राजा की इच्छा के विरूद्ध जनता कुछ भी नहीं कर सकती थी। अब आदर्श लोकतंत्र में जनता की इच्छा के बिना राज्य कुछ नहीं कर सकता क्योंकि उस समय राजा का संविधान था और अब संविधान के अन्तर्गत राज्य के तीनो अंग। दुर्भाग्य से भारत की जनता को संविधान बनाने वालों ने धोखा दिया। उन्होंने लगातार प्रचारित किया कि भारत में संविधान का शासन होगा। संविधान के अन्तर्गत ही संसद कार्य करेगी। किन्तु चुपके से उन्होंने संविधान में ही यह भी लिख दिया कि संविधान में संशोधन का अधिकार भी संसद को ही होगा। इस प्रकार भारतीय लोकतंत्र में संविधान का शासन न होकर शासन का संविधान हो गया जिसमें शासक एक व्यक्ति न होकर एक व्यवस्था का हुआ अर्थात जनता शासक को चुन सकती है किन्तु चुने जाने के बाद वह सर्वाधिकार सम्पन्न होगा और उस पर जनता का कोई हस्तक्षेप नहीं होगा। मेरे विचार से भारतीय संविधान मे जबतक संविधान संशोधन के अधिकार मे लोक और तंत्र की मिली जुली भूमिका का कोई प्रावधान नही होता तब तक यह संविधान हमारे देश के लिये कलंक है।
राम राज्य अच्छे राजा की अच्छी व्यवस्था थी। अच्छी व्यवस्था द्वारा अच्छा राज्य चले यह राम राज्य नहीं है। आज भी भारत के आम लोग अच्छा शासक चुनने की प्रणाली से बाहर नहीं निकल सके हैं। शासक तो कभी चाहता ही नहीं कि व्यवस्था बदले और किसी संविधान के अन्तर्गत शासन चले। शासक तो वर्तमान राजनैतिक व्यवस्था का ही गुणगान करता रहता है जबकि आदर्श स्थिति यह होगी कि व्यवस्था बदले। राम राज्य की परिकल्पना हमें वर्तमान गुलामी से कभी मुक्त नहीं होने देगी क्योंकि वर्तमान संवैधानिक व्यवस्था में संशोधन परिवर्तन के अधिकार से हम बाहर हैं। जब तक संविधान का शासन न हो तथा संविधान संशोधन में जनता की भागीदारी का प्रावधान न बने तब तक चाहे शासन किसी का हो, सत्ता बदल सकती है किन्तु व्यवस्था तो वही की वही रहेगी। यदि हम व्यवस्था परिवर्तन के किसी भी मार्ग पर आगे बढ़ना चाहते हैं तो संविधान संशोधन की वर्तमान प्रणाली में से या तो तंत्र को पूरी तरह बाहर करना होगा अथवा वर्तमान संविधान संशोधन प्रणाली में तंत्र के साथ साथ लोक की भी भूमिका का समावेश करना होगा। इसके अतिरिक्त किया जाने वाला कार्य सुराज ला सकता है, रामराज ला सकता है किन्तु कोई ऐसी संवैधानिक व्यवस्था नहीं ला सकता जो रावण राज या कुराज को रोक सके। हमने जिसे चुन दिया वह यदि राम के वेश में रावण भी हो तो हमें पांच वर्ष तक उसकी गुलामी झेलनी ही होगी क्योंकि जिसका शासन उसी का संविधान।
                     वर्तमान समय में व्यवस्था परिवर्तन के नाम पर अनेक संगठन सक्रिय हैं। अभी अभी गुजरात में केशु भाई पटेल भी व्यवस्था परिवर्तन की रट ही लगाना शुरू किये हैं यद्यपि ये व्यवस्था परिवर्तन का क ख ग घ भी नहीं समझते। फिर भी कुछ गंभीर संगठन व्यवस्था परिवर्तन के नाम से सक्रिय हैं। इनमें स्वदेशी आंदोलन, आर्थिक सहायता आंदोलन, आंदोलन बाबा रामदेव, आंदोलन अन्ना हजारे, आंदोलन लोकसंसद आदि प्रमुख हैं। ये सभी आंदोलन सीधे सीधे सत्ता संघर्श में नहीं दिखते भले ही अन्दर अन्दर किसी की सोच कुछ भी क्यों न हो। यदि हम स्वदेशी आंदोलन की समीक्षा करें तो इसमें न तो सत्ता परिवर्तन की कोई गंध आती है न ही व्यवस्था परिवर्तन की कोई दिशा दिखती है। इस आंदोलन में मुख्य रूप से सर्व सेवा संघ तथा राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के लोग सक्रिय हैं। लेकिन इनका आंदोलन आप लिखें खुदा बांचे की तर्ज पर निरंतर जारी है। स्वदेशी का अर्थ स्थानीय होगा या भारतीय यह भी ये लोग स्पष्ट नहीं कर सके हैं। लगता है कि विदेशी उद्योगपतियों के विरूद्ध भारतीय उद्योगपतियों के मोर्चे से ज्यादा इस आंदोलन की कोई भी भूमिका नहीं है। इसका न भारत की राजनैतिक व्यवस्था के विषय में कोई गंभीर सोच है न सामाजिक व्यवस्था के विषय में । भारत के राजनैतिक व्यवस्था पूरी खुशामद करके विश्व बाजार को आमंत्रित कर रही है और ये लोग उन वस्तुओं के सामाजिक बहिष्कार की बात समझाने में ही लगे हुए हैं। व्यवस्था परिवर्तन के नाम से एक ऐसा समूह भी सक्रिय है जो आम नागरिकों की आर्थिक अवस्था परिवर्तन को ही व्यवस्था परिवर्तन मानता है। ऐसे संगठनों में भरत गांधी जी, रोशन लाल जी, प्रमोद कुमार वात्सल्य जी आदि अलग अलग समूहों में सक्रिय हैं। ये लोग सत्ता में आने के बाद समाज के लोगों को प्रति व्यक्ति सत्रह सौ से दस हजार रूपया मासिक गुजारा भत्ता देने की घोषणा करते हैं। हम भी यह तो चाहते हैं कि वर्तमान में दी जा रही सब्सीडी एक मुफ्त तथा नगद रूपये के रूप में हो, ऐसी सब्सीडी के लिये कृत्रिम उर्जा पर भारी कर लगाये जायें, ग्रामीण गरीब श्रमजीवी उत्पादन उपभोग की वस्तुओं पर लगने वाले सभी कर समाप्त हों। हम यह भी चाहते हैं कि स्वतंत्र अर्थपालिका हो जिससे राजनेता अर्थ व्यवस्था को राजनैतिक हथियार के रूप में उपयोग न कर सकें किन्तु इन सब आर्थिक विचारों से दूर सिर्फ पैसा बांटने की मांग सिर्फ सत्ता परिवर्तन के प्रयास तक सीमित लगती है। इसका व्यवस्था परिवर्तन से संबंध नहीं दिखता।
                      व्यवस्था परिवर्तन के नाम से बाबा रामदेव भी बहुत दौड़ धूप कर रहे हैं। इनका कथन है कि हम सत्ता में आयेंगे तो विदेशों में छिपा कर रखा गया काला धन भारत में वापस ले आयेंगे। इस धन से भारत के आम लोगों की आर्थिक स्थिति बहुत मजबूत हो जायेगी। मेरे विचार में न तो रामदेव जी की मांग में कोई दम है न ही आंदोलन में। आर्थिक समाधान अवस्था परिवर्तन ही कर सकते हैं व्यवस्था परिवर्तन नहीं। विदेशों से काला धन भारत आ जायगा तो भारत में चोरी, डकैती, बलात्कार, मिलावट, चरित्र पतन, भ्रष्टाचार, साम्प्रदायिकता, जातिवाद, श्रमशोषण जैसी समस्याओं पर कोई प्रभाव नहीं पड़ सकता। इतना अवश्य होगा कि इस आंदोलन से बाबा जी के पास जमा कुछ धन समाज के पास आ जायगा।
                        व्यवस्था परिवर्तन के लिये एक और गंभीर प्रयास अन्ना जी की टीम का है। यह टीम लोकपाल का आंदोलन कर रही है। लोकपाल कानून बन जाने से राजनैतिक भ्रष्टाचार में कुछ कमी आना संभव है किन्तु यह भी किसी भी रूप में व्यवस्था परिवर्तन नहीं है। भ्रष्टाचार राजनैतिक शक्ति के केन्द्रीयकरण का परिणाम है, कारण नहीं। पहली बात तो यह है कि सत्ता के अकेन्द्रीयकरण के बिना भ्रष्टाचार पर अंकुश लग ही नहीं सकता। यदि लग भी गया तो सुराज आ सकता है किन्तु लोक और तंत्र के बीच दूरी घटेगी नहीं। समाज आज की तरह गुलाम का गुलाम ही रहेगा। भ्रष्टाचार नियंत्रण भी व्यवस्था परिवर्तन नहीं है।
                       मेरे विचार में व्यवस्था परिवर्तन की एक ही पहचान है और वह है सहभागी लोकतंत्र। परिवार, गांव, जिले को विधायी अधिकार देने का प्रयास ही व्यवस्था परिवर्तन है। प्रसिद्ध गांधीवादी ठाकुर दास जी बंग ने लम्बे समय तक इसके लिये देश भर में जनमत जागरण किया। आज भी सिद्धार्थ शर्मा बेंगलूर, एम एच पाटिल बेंगलूर, छबील सिंह सिसोदिया गाजियाबाद सरीखे अल्प विख्यात चेहरे लोक स्वराज्य मंच के नाम से इस मशाल को प्रज्वलित कर रहे हैं। यही एकमात्र कार्य है व्यवस्था परिवर्तन। जब तक परिवार व्यवस्था गांव व्यवस्था मजबूत और अधिकार सम्पन्न नहीं होती तब तक न चोरी, डकैती, बलात्कार, मिलावट की रोकथाम संभव है न भ्रष्टाचार, चरित्र पतन, साम्प्रदायिकता, जातिवाद और श्रमशोषण की। ऐसी सभी प्रमुख समस्याओं का समाधान है परिवार व्यवस्था, गांव व्यवस्था को मजबूत करना। भारत परिवारों का संघ बने। परिवार तथा गांव को विधायी अधिकार मिलें। सरकार की भूमिका मैनेजर की हो, कस्टोडियन की नहीं। यह है व्यवस्था परिवर्तन।
                    हम बार बार लोक संसद को आंदोलन का सूत्र बनाने की बात कर रहे हैं। लोक संसद आंदोलन भी स्वयं में व्यवस्था परिवर्तन न होकर व्यवस्था परिवर्तन की दिशा में उठा एक कदम मात्र होगा। लोक संसद राइट टू रिकाल द्वारा सांसदों की मनमानी पर रोक लगायेगा। लोक संसद द्वारा वर्तमान संसद के संविधान संशोधन अधिकार सीमित हो जायंगे। लोक संसद होने से वर्तमान संसद मनमानी वेतन वृद्धि नहीं कर सकेगी। लोक संसद होने से वर्तमान संसद अन्य संवैधानिक इकाइयों पर अपनी दादागिरी नहीं चला सकेंगी।
                      लोक संसद भले ही अनेक समस्याओं के समाधान का मार्ग खोलती है किन्तु व्यवस्था परिवर्तन के लिये तो हमें लोक संसद से भी आगे जाकर परिवार गांव जिले के विधायी अधिकारों की सूची संविधान मे शामिल करनी होगी। हम यदि ऐसा करने मे सफल हुए तब तो हम कुछ सीमा तक गुलामी से छुटकारा पा सकते हैं अन्यथा चुनावों का अवसर देखकर हमे गुलाम बनाकर रखने की लालच मे भिन्न भिन्न बहुरूपियें हमे अनेक प्रकार के लालच देकर समझाते रहेंगे और कोई अन्य मार्ग न देखकर हम इन्ही मे से किसी एक को वोट देकर लोकतांत्रिक गुलामी की स्वीकारोक्ति पर मुहर लगाते रहेंगे ।

Monday, August 6, 2012



'निंदक नियरे राखिये'
यानि
विरोधियों को नज़दीक ही राख़ कर दीजिये .


आखिर कांग्रेस हित में अन्ना आन्दोलन का समापन हुआ.
पैदा भी कांग्रेस द्वारा ही कराया गया था. क्या आप जानते हैं ?
'न 9 मन तेल होगा न राधा नाचेगी' में राधा ने 9 मन तेल माँगा होगा क्या नाचने के लिए ?

अपनी डफली

सब अपनी डफली अपने राग पे लग गये हैं. 
अब अपनी डफली कोई किसी को क्यों देगा, 
पहले किसी की डफली किसी ने तोड़ दी होगी.

Wednesday, July 25, 2012

मस्त आँखों के पियो जाम
**************************************
पीके आँखों से लगी दिल की बुझा लेता हूँ 
माशुका तेरी कसम, तुझको दुआ देता हूँ 
तेरी मदमस्त निगाहों ने कर्म मुझपे किया 
ज़िन्दगी भर न अपना मुझे कुछ होश रहा
पीके मैं जाम नशीले तेरे, जी लेता हूँ
माशुका तेरी कसम, तुझको दुआ देता हूँ
छोड़ दो पीना शराब अब तो ये मेरे यारो
मस्त आँखों के पियो जाम नशीले, यारो
अब कहां सब्र मुझे, मैं तो पिए लेता हूँ
माशुका तेरी कसम, तुझको दुआ देता हूँ
तेरी आँखों में मिला मुझको मिरे गम का इलाज
अब न 'अर्पित' सिवा तेरे मिरा कोई आज
जानकर तुझको मसीहा, ये दवा लेता हूँ
माशुका तेरी कसम, तुझको दुआ देता हूँ .
----------------------------------------------अर्पित अनाम

Sunday, July 22, 2012


हम जियें भी तो जियें कैसे बताओ 'अर्पित'
**********************************************
बेवफा छत पे मुझे देखने आया न करो
दिल को अब और मिरे यूँ तो सताया न करो
प्यार आता है मुझे जिसपे, वो अपनी सूरत
मुझको छुप-छुप के यूँ तरसा के दिखाया न करो
जब नहीं पास तुम्हारे, मिरे ज़ख्मों का इलाज़
दुखती रग को तो मिरी छेड़ के जाया न करो
हम जियें भी तो जियें कैसे बताओ 'अर्पित'
उनके कूचे में, वो कहते हैं कि आया न करो.
================================अर्पित अनाम
हर व्यक्ति को ऐसा व्यक्तिगत निर्णय लेने की स्वतन्त्रता होनी चाहिए,
जिससे किसी दूसरे व्यक्ति की स्वतंत्रता का हनन न हो .

Saturday, July 21, 2012

आरजू है बस यही
****************************
खुश रहोगे तुम तो मैं भी खुश रहूँगा, ऐ सनम 
देखकर चेहरा तुम्हारा मैं जियूँगा, ऐ सनम 
जां निकल जाती है मेरी देखकर तुमको उदास 
दुख न इक पल भी तुम्हारा सह सकूंगा, ऐ सनम
चाँद सा चेहरा, गुलाबी होंठ, ज़ुल्फें रेशमी
और भी निखरें, दुआ दिल से करूंगा, ऐ सनम
आरजू है बस यही 'अर्पित' कि तुम सुख से रहो
जाम सेहत के तुम्हारी मैं भरूँगा, ऐ सनम
+++++++++++++++++++++++++++++ अर्पित अनाम

Thursday, July 19, 2012

मान जाना याद है 
********************************
तेरा अंदाज़ ऐ सनम वो कातिलाना याद है 
और रह-रह कर तिरा वो मुस्कराना याद है 
बैठना मिलजुल के तेरा, रूठ जाना फिर तिरा 
रूठ कर फिर जाने-जाना मान जाना याद है
याद आती हैं मुझे रह-रह के तेरी शोखियाँ
छेड़कर मुझको वो तेरा खिलखिलाना याद है
एकदम खामोश हूँ, तब पास मेरे बैठना
और गुमसुम होके यूँ, जी को जलाना याद है
देखना, आदाब करना, मुस्कराना, ऐ सनम
और आंचल में तिरा वो मुंह छुपाना याद है
तोडकर गुल को मसलना, फिर उठाकर फेंकना
दिल पे 'अर्पित' मुझको उनका ज़ुल्म ढाना याद है
~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~अर्पित अनाम
हो तेरा इन्साफ़ 'अर्पित' एक सा सब के लिए 
++++++++++++++++++++++++++++++++


ढूँढने से क्या मिलेगा वो किसी इन्सान को
कर कोई तू काम ऐसा, खुश करे भगवान को

मन्दिरो-मस्जिद दुखी हैं यूँ की उनके नाम पर
मिल गई है छूट नर संहार की शैतान को

सोचिये गिरिजाघरों में सर झुकाकर क्या मिला
और गुरु द्वारों में जाकर क्या मिला श्रीमान को

कर भला औरों का, तेरा भी भला हो जाएगा
तू अगर इन्सान है तो त्याग दे अभिमान को

हो तेरा इन्साफ़ 'अर्पित' एक सा सब के लिए
निर्धनों को दे वही इन्साफ़ जो धनवान को

**********************************************अर्पित अनाम

Wednesday, July 18, 2012

किस तरह ज़िन्दा हो तुम 
****************************************

बेवफाई का गिला हमने जो उनसे कर दिया
दोष इसका हाय, हम पर ही उन्होंने धर दिया 

मुस्करा कर तो कभी चुप साध कर प्रतिवाद में 
मेरे हर आरोप का खंडन उन्होंने कर दिया 

दिल की चोरी और उस पर सीनाज़ोरी, ऐ सनम 
आपने तो मात सबको इस कला में कर दिया

प्यार से मरहम लगाने की जगह बेदर्द ने,
लेके चुटकी में नमक, ज़ख्मों में मेरे भर दिया

आप की नज़रों में ठहरा एक मुज़रिम इसलिए
आपने मुझको गिरफ्तार-ए-मुहब्बत कर दिया

मुझको हैरत है की 'अर्पित' किस तरह ज़िन्दा हो तुम
इश्क में पड़कर जो तुमने ओखली में सर दिया .

+++++++++++++++++++++++++++++++++++++++ अर्पित अनाम

देखो आज उठ नहीं रही है उनकी आंख मेरे सामने
इंसाफ की जो बात करके मिले गये हैं जुल्मियों से
त्याग ही जीवन है.

इस जहाँ में अब नहीं कोई भी तो 'अर्पित' तेरा

सामने बैठी हो क्यों तुम दिल दुखाने के लिए
बात ही  कोई न  हो  जब  मुस्कराने  के लिए
दिल तो करता है मेरा अब फोड़ लूँ मैं अपना सर
और मिल जाये कहीं से ज़हर खाने के लिए
तुम ही कहती थी कभी मुझको न यूँ देखा करो
छोड़ दो मुझको अकेला टूट जाने के लिए
झुकना उठना हाथ तेरे ही तो था ऐ संगदिल
सब लुटा, अब क्या रहा है सर उठाने के लिए
नाज़ था जिसपर मुझे, इक प्यार का सागर था जो
खाई है सौगन्ध उसने यूँ सताने के लिए
इस जहाँ में अब नहीं कोई भी तो 'अर्पित' तेरा
चल किसी दरिया में अब तो डूब जाने के लिए
--------------------------------------------------अर्पित अनाम --------------------------------
ठोकरें ही चलना सिखाती हैं 
मैं हिंसा में विश्वास नहीं रखता .
अहिंसक संघर्षप्रेमी हूँ .
कुछ व्यक्तियों में भड़काने की 'कला' होती है.

Monday, July 16, 2012

नादान आजकल पाखण्ड का ज़माना

***************
शीशे को तोड़ देंगे बेरहम दुनिया वाले
जीना अगर है तुझको पत्थर जिगर बनाले
हो नेक आदमी तो कहते हैं लोग पागल
शैतान बन जा तू भी माथे तिलक लगाले
नादान आजकल है पाखण्ड का ज़माना
तू भी जटा बढ़ा ले, धूनी कहीं रमा ले
इन्सान बनके काफ़िर कहला रहा है क्यों तू
तस्बीह भी घुमाले, कृपाण भी उठाले
अपनी ही जान देने में क्या है अक्लमंदी
उन ज़ालिमों को 'अर्पित' उनकी तेरह सताले
-------------------------------------------------अर्पित अनाम

Monday, July 9, 2012


थी ख़बर गर्म कि गालिब के उड़ेंगे पुरज़े
देखने हम भी गए थे पर तमाशा ना हुआ
जो जितना बड़ा भगत होने का दिखावा करता है,
वह उतना ही बड़ा ठगत होता है ?

Thursday, July 5, 2012

मत रोको तुम उनको


सर मेरा दीवारों से टकराने दो
इस दिमाग को अब तो बस फट जाने दो
जिंदा रह के आखिर क्या कर पाऊंगा
अब न रोको मुझको तुम मर जाने दो
ख़ुशी नहीं जब कोई भी अब शेष रही
गीत विरह के गाता हूँ तो गाने दो
तुमको क्या है उनको क्यों कुछ कहते हो
गम का मेरे उनको जश्न मनाने दो
मिलता है गर चैन उन्हें कुछ 'अर्पित' यूँ
मत रोको तुम उनको,    खूब सताने दो .
***** अर्पित अनाम

Friday, June 29, 2012


कुर्बानियां देने का ठेका ही हमारे पास है
हक पराया लूट लें वो इसकी उनको आस है
--अर्पित अनाम

ज़हर क्यों हिस्से हमारे आ रहा है
जिसने बोये कांटे अमृत पा रहा है
--अर्पित अनाम

उसूल भी कभी कभी कमजोरी बन जाते हैं .
--अर्पित अनाम
आह ! नीचता की सब हदें तो कर गये हैं पर वो 
इससे ज़्यादा क्या गिरेंगे गर्त में वे अब अधम
--अर्पित अनाम

Monday, June 25, 2012


बुराई वे करें, बदनामियाँ हिस्से मेरे आएं
अच्छाई हम करें, शाबासियां वे लूट ले जाएं
--अर्पित अनाम
हे भगवन यदि इन्सां बुरे तूने बनाये हैं
तो मुजरिम तू भी है सच की हमारी इस अदालत का
--अर्पित अनाम

Saturday, June 23, 2012

सच के सहारे

सच के सहारे
देर से ही सही
जीत सुखदायक होगी
मैं एक ऐसे आदमी को जानता हूँ जो लम्बा तिलक लगाये, 
माला हाथ में लेकर 'कृष्ण-कृष्ण' जपता रहता है और साथ ही 
काम कपटपूर्ण करता रहता है . 
ऐसा क्यों ? 

Friday, June 22, 2012

अच्छाई


मुझे अच्छाई पसंद हैं.
अच्छाई भले ही किसी बुरे व्यक्ति से ही क्यों न मिले, 
उसे ग्रहण करने में मैं कोई बुराई नहीं मानता हूँ .

तो करते क्यों हैं ?




कुछ लोग दूसरों से तो भरपूर मजाक कर लेते हैं
किन्तु यदि कोई उनसे मजाक करने की गुस्ताखी कर बैठे तो वे गाली गलोच तक पर उतर आते हैं .
ऐसा क्यों ?
यदि हम मजाक सह नहीं सकते तो करते क्यों हैं ?


Wednesday, June 20, 2012

कई बार लोग क्या कहते हैं --
''उसका 'दिमाग' पागल हो गया है"
.... तब मैं कहता हूँ , "नहीं उसकी 'नाक' पागल हुई है"....

Tuesday, June 19, 2012

आग


इक आग धधकती है भीतर
कुछ धुआं धुआं सा उठता है
जब सामने होता अन्याय
तो रुआं रुआं सा उठता है .
---अर्पित अनाम

Monday, June 18, 2012

हमारा किसी पर हंसना हमारी अज्ञानता का प्रतीक होता है . ---अर्पित अनाम
निस्वार्थ व्यवहार का नाम मित्रता है .
--अर्पित अनाम

हे प्रभु, मुझे विप्तियाँ प्रदान कर, जिनसे संघर्ष कर मैं अनुभव प्राप्त कर सकूं .
-अर्पित अनाम

Saturday, June 16, 2012

किसी भी व्यक्ति की आत्मा गलत कार्य करने की अनुमति नहीं देती.
----अर्पित अनाम

अन्ना का थप्पड़

अन्ना का थप्पड़ किस-किस को पड़ेगा ?
भ्रष्टाचार हिन्दोस्तान की नस-नस में फ़ैल चुका है .

व्यवहार


जिससे अपने लिए जैसे व्यवहार की इच्छा हो उससे वैसा ही व्यवहार करो !
----अर्पित अनाम

Friday, June 15, 2012


बिन किये कर्म अच्छे, नहीं उद्दार होगा
अटके दुष्कर्म से बेड़ा, नेक से पार होगा
-----अर्पित अनाम

Thursday, June 14, 2012

आग धधकती है

सब कुछ सह सकता हूँ मैं, अन्याय मुझे स्वीकार नहीं 
इसलिए तो आग धधकती है, मैं झूठ का पहरेदार नहीं 
----अर्पित अनाम
जीने भी नहीं देते हैं मरने भी नहीं देते 
यारब तेरी दुनिया के ये लोग किस तरह के 
----अर्पित अनाम

चुप रहना ही है भला जब तक मन निष्प्राण
कहने को तो बहुत कुछ दिल में हैं अरमान
----अर्पित अनाम

Tuesday, June 12, 2012

आधे मूर्ख


मेरे एक मित्र हैं रायपुर के श्री रोशन लाल अग्रवाल जी.
एक बार एक सभा में उन्होंने कह दिया- "यहाँ आधे लोग मूर्ख हैं".
सभा में हंगामा हो गया.  उन पर अपने शब्द वापिस लेने का दबाव बनाया गया.
आखिर उन्होंने अपने शब्द वापिस लेते हुए कहा- "यहाँ आधे लोग मूर्ख नहीं हैं".

Saturday, June 9, 2012

हैवानियत से इस जहां में अनजान कोई न मिला 
खोजने तो थे फरिश्ते, इंसान कोई न मिला 
आश्रमों में मिल जाएं आडम्बर ओढ़े बहुतेरे
रावण ओ' कंसों को मरे भगवान कोई न मिला 
शेर घूमता रहा शिकारियों की खोज में 
मरने को बेचैन था मचान कोई न मिला
उमड़ते रहते हैं यूँ टूटे हृदय में हर वक्त
टकराए जो आहों से तूफान कोई न मिला
ज़ख्मी ये सीना पड़ा है तीर भी अब पास हैं
छोड़ दें हम भी मगर कमान कोई न मिला
अज़ब ये दुनिया हुई है अज़ब इसकी दास्तां
हैं सहज सब ही यहां हैरान कोई न मिला
---------------अर्पित अनाम---------------

Tuesday, June 5, 2012

मानवों से आज मानव हो रहा बेहाल है 


भूल मानव धर्म अपना दुष्ट चलता चाल है 


कुछ व्यवस्था ही बनी ऐसी कि हैं भयभीत सब 


रक्षकों का यूँ तो कहने को बिछा इक जाल है 


यूँ अकड़ कर चल रहे मनो खुदा हैं बस वही 


हैं भली टांगें मगर टेढ़ी ही टेढ़ी चाल है


बेबसी का घोंट कर दम खून सारा पी लिया


पेट काटे जो पराये आज वह प्रतिपाल है


साथ देने की सदा सुनकर तो आए वह मगर


सुर में सुर कैसे मिले जो बेसुरी सी ताल है


शक भी कोई क्या करे 'अर्पित' भी अर्पित हो गया


एक दाना ही नहीं काली ही सारी दाल है .


--------------अर्पित अनाम----------

Friday, June 1, 2012

फूट डालो और राज करो की नीति का सर्वाधिक उपयोग औरतें करती हैं .

नेक कर्म

कर्म करले नेक फिर बीता न कोई पल मिले 


होगा जैसा कर्म जिसका वैसा उसको फल मिले 


दुश्चरित्रों की भी सह लो है इसी में उच्चता


बल न सहने का यदि तो घुन-घृणा को बल मिले


रास यदि आई न दुनिया तो रुदन यह किसलिए 


हर समस्या का यहाँ संघर्ष ही से हल मिले


आग लग जाने पे खोदा भी तो क्या खोदा कुआं


बात तो तब है शमन को आग के जब जल मिले


लाख गहराई में ढूंढो श्रम है वो सारा वृथा


हाथ मोती क्या लगे जब तक न जल का तल मिले


जीत सकते हो हृदय 'अर्पित' सरल व्यवहार से


बात अचरज की नहीं जो छल के बदले छल मिले


--अर्पित अनाम


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Friday, May 25, 2012

धड़कन बन के आजा



कहां है कहां है तू ये तो बता जा


सुरीली सी धुन में कोई गीत गा जा


अदाएं नशीली सी जब आएं मन में

ख़ाबों की यादें वो लगती खटकने

वो मोहिनी सी सूरत तू आ के दिखाजा

सुरीली सी धुन में कोई गीत गा जा


हैं सूनी ये राहें बिना तेरे दिलबर

मैं गिरता ही जाता हूँ बिन तेरे पल-पल

दे सदा हाय मुझको या खुद पास आजा

सुरीली सी धुन में कोई गीत गा जा


वो तेरी सदा थी तू मेरी मैं क्या हूँ

ये वो राज़ है जिसपे 'अर्पित' हुआ हूँ

दिल बनके आऊँ धड़कन बन के आजा

सुरीली सी धुन में कोई गीत गा जा

                                         -अर्पित अनाम

Wednesday, May 23, 2012

उनकी बला से, दूसरा चाहे मरे चाहे जिए


मजबूरियों का फायदा, उनसे उठाना सीखिए

आता नहीं हमको नजर शहतीर अपनी आंख का

क्यों दूसरों की आंख में तिनका सदा ढूंढा किये

उनके सिवा सब हैं बुरे, सारे जहाँ में देख लो

कहने का उनके हर यही मतलब निकलता किसलिए

क्या दमन होगा इससे ज्यादा, बोलने पर रोक है

फरियाद किससे और कैसे क्या किये रे क्या किये

तू सोचले 'अर्पित' मिलेगा ये सिला ही हर तरफ

बदनामियाँ ही आयेंगी हिस्से, भला जितना किये

Friday, May 4, 2012


एलेक्स को चाहिए कि अपने दिवगंत सुरक्षा कर्मी के घर जाकर सांत्वना दे और सहयोग करे .

Wednesday, May 2, 2012

in aankhon mein mere jaisi ye do moorten
hain kis-kis ki, zra ye to bta
ik to main hun teri ik aankh mein
dooji mein kaun 'arpit' hai mere siwa.

Friday, April 27, 2012

वे रूठे तो हर बार मनाया हमने
उनसे तो इकबार भी हमें मनाया न गया

Wednesday, April 11, 2012

भारतीय मुद्रा पर गाँधी के चित्र के स्थान पर सुभाष बोस, भगत सिंह के चित्र भी प्रकाशित होने चाहियें .

Saturday, March 31, 2012

बहुत सोचता हूँ कि कुछ सोच लूँ
मगर सोचते-सोचते थक गया हूँ 

Thursday, March 15, 2012

क्या भारत में अमीरी गरीबी की खाई लगातार बढ़ रही है ?

१. हाँ
२. नहीं
३. पता नहीं

Sunday, March 11, 2012

रुसवाइयां दुनिया की हम जिनके लिए सहते रहे
दामन वही हमसे बचा कर बेवफा रहते रहे .

Wednesday, March 7, 2012

उ. प्र. में माया मिली न राम

Friday, February 24, 2012

रामदेव को अपनी सेना को छोडकर भागने के लिए कुछ तो सजा मिलनी चाहिए थी ... ?

Friday, February 3, 2012

कोर्ट का હથોડા अब लगा थोडा

Thursday, January 26, 2012

गणतन्त्र

क्या हमारा गणतन्त्र अधूरा है ?

अन्ना का थप्पड़

अन्ना का थप्पड़ किस-किस को पड़ेगा ?
भ्रष्टाचार हिन्दोस्तान की नस-नस में फ़ैल चुका है .

Monday, January 23, 2012

जूतम-पैजार

जो जनता के खिलाफ काम करे उसे भी जूते,
जो जनता की आवाज उठाये उसे भी जूते .
यह जूतम-पैजार बंद होनी चाहिए .

Wednesday, January 18, 2012

क्यों डर रहे हो सलमान रश्दी से,
खा तो नहीं जाएगा,
आने दो !

Sunday, January 15, 2012

विक्षिप्त मानसिकता

जूता, चप्पल, थप्पड़, स्याही
विक्षिप्त मानसिकता की परिचायी
करके कुछ दिखलाया होता
तब मिलती इनको वाहवाही


Friday, January 6, 2012

अन्ना हजारे हुए बेचारे !
कुशवाहा !
कुश ! वाहा !
कुशवा ! हा !