Friday, November 6, 2009

सच बोलना खतरनाक है यहां

सच बोलना खतरनाक है यहां सच बर्दाश्त नहीं किया जाता बेबाक रूप से विचार प्रकट करना यहां खतरे से खाली नहीं यहां लोग वही सुनना चाहते हैं, जो उन्हें पसंद होता है

Monday, September 7, 2009

चुनाव में पैसा प्रधान

चुनाव में पैसा प्रधान हो गया है । शराफत, ईमानदारी पीछे छूट गई है । ऐसा इसलिए हुआ क्योंकि शरीफों में बिखराव है । यदि शरीफ एकजुट हो जाएं तो निश्चित ही शराफत, ईमानदारी की कीमत बढ़ जाए ।

Sunday, August 16, 2009

शरीफ़ो एक हो जाओ

देशभर के शरीफ़ो एकजुट हो जाओ ।
गुंडों ने गिरोह बना रखे हैं ।
शरीफ़ लोग क्यों नहीं बनाते ।
गुंडे गिरोह बनाकर शरीफ़ो का जीना दुश्वार किए रहते हैं ।
शरीफ़ आत्मरक्षा के लिए भी इकट्ठे नहीं हो सकते, क्यों ?

Wednesday, July 8, 2009

बेसब्री से इंतजार

भारत की जन समस्याओं से चिंतिंत कुछ व्यक्तियों द्वारा यह देख परख कर कि किसी भी राजनैतिक पार्टी को इन समस्याओं से कोई लेना देना नहीं है और वे केवल सत्ता को व्यापार के रूप में अपनाकर कार्य कर रही हैं, एक शोध में इन्हें हल करने के उपायों को खोजकर एक विस्तृत योजना बनाई गई है । इस योजना के क्रियान्वयन के लिए ऐसे व्यक्तियों कि टीम तैयार कि जा रही है जो इन समस्याओं को हल करने के प्रति गम्भीर हों । यदि आपके मन भी ऐसी ही कसक है और आप वर्तमान व्यवस्था से असंतुष्ट हैं तो हम आपका बेसब्री से इंतजार कर रहे हैं । आइये, इस निराशाजनक व्यवस्था को बदलने में हम सब मिलजुलकर कार्य करें ।

Monday, June 22, 2009

क्या घड़ा अभी भरा नहीं

अपराधी किस्म के लोग राज कर रहे हैं और शरीफ लोग घरों में दुबक कर बैठे हैं । ये शरीफ लोग किस बात का इंतजार कर रहे हैं । क्या घड़ा अभी भरा नहीं है ?

Monday, June 15, 2009

जीत कर भी हारता है इंसान

कई बार एक व्यक्ति को एक ही समय कई-कई मोर्चों पर लडाई लड़नी पडती है । अभिमन्यु की तरह चक्रव्यूह में घिरे व्यक्ति को अपनों से भी युद्घ करना पड़ता है । इस युद्घ में वह जीत भी सकता है और हार भी सकता है । किंतु इस जीतने और हारने दोनों में उसकी हार ही होती है ।

Saturday, June 13, 2009

निराशाजनक व्यवस्था

भारत की वर्तमान व्यवस्था बहुत ही निराशाजनक हो गई है सारी शक्ति ऊपर बैठे चंद हाथों में सिमट कर रह गई है नीचे बैठे लोग अक्सर ज्यादती का शिकार होते रहते हैं और कुछ नहीं कर पाकर मन मसोस कर रह जाते हैं आख़िर कब तक होगा ऐसा ?

Monday, June 8, 2009

सच बोलूं जो तब तो शामत आती है
चुप रहना भी नागवार गुज़रे है मुझे
-अर्पित अनाम

Tuesday, June 2, 2009

बन्दा उम्र बढ़ने के साथ-साथ व्यवहारिक हुआ जाता है
भावुकता पीछे छूटने लगती है
अनुभव की ठोकरें सिखा-सिखा कर परिपक्व बना देती हैं ।
-अर्पित अनाम

Thursday, April 30, 2009

अच्छे लोगो ! राजनीति में आइये

'राजनीति गंदी चीज है', गंदे लोगों द्वारा अच्छे लोगों को राजनीति में आने से रोकने के लिए प्रचारित किया गया यह संदेश अच्छे लोगों द्वारा भी जाने अनजाने आगे बढ़ाया जा रहा है । गंदे लोगों की इस साजिश को बेनकाब करना होगा। समाज व देश को गंदे लोगों की इस साजिश का शिकार होते रहने से बचाना है । अब और नहींसमाज व देश का ठेका इन्ही गंदे लोगों के पास रहे, अब यह नहीं चलेगा । अच्छे लोगों को राजनीति में आना होगा । मैं अच्छे लोगों को पुकारता हूँ । आइये, राजनीति में आइये । इस चुनौटीपूर्ण कार्य को हाथ में लेकर यह सिद्ध करके दिखाइए कि गंदे लोगों द्वारा इस समाज देश का जितना नुकसान किया गया है, उससे कहीं ज्यादा फायदा अच्छे लोगों द्वारा प्रयास करके पहुँचाया जा सकता है ।
-अर्पित अनाम