Friday, June 29, 2012


कुर्बानियां देने का ठेका ही हमारे पास है
हक पराया लूट लें वो इसकी उनको आस है
--अर्पित अनाम

ज़हर क्यों हिस्से हमारे आ रहा है
जिसने बोये कांटे अमृत पा रहा है
--अर्पित अनाम

उसूल भी कभी कभी कमजोरी बन जाते हैं .
--अर्पित अनाम
आह ! नीचता की सब हदें तो कर गये हैं पर वो 
इससे ज़्यादा क्या गिरेंगे गर्त में वे अब अधम
--अर्पित अनाम

Monday, June 25, 2012


बुराई वे करें, बदनामियाँ हिस्से मेरे आएं
अच्छाई हम करें, शाबासियां वे लूट ले जाएं
--अर्पित अनाम
हे भगवन यदि इन्सां बुरे तूने बनाये हैं
तो मुजरिम तू भी है सच की हमारी इस अदालत का
--अर्पित अनाम

Saturday, June 23, 2012

सच के सहारे

सच के सहारे
देर से ही सही
जीत सुखदायक होगी
मैं एक ऐसे आदमी को जानता हूँ जो लम्बा तिलक लगाये, 
माला हाथ में लेकर 'कृष्ण-कृष्ण' जपता रहता है और साथ ही 
काम कपटपूर्ण करता रहता है . 
ऐसा क्यों ? 

Friday, June 22, 2012

अच्छाई


मुझे अच्छाई पसंद हैं.
अच्छाई भले ही किसी बुरे व्यक्ति से ही क्यों न मिले, 
उसे ग्रहण करने में मैं कोई बुराई नहीं मानता हूँ .

तो करते क्यों हैं ?




कुछ लोग दूसरों से तो भरपूर मजाक कर लेते हैं
किन्तु यदि कोई उनसे मजाक करने की गुस्ताखी कर बैठे तो वे गाली गलोच तक पर उतर आते हैं .
ऐसा क्यों ?
यदि हम मजाक सह नहीं सकते तो करते क्यों हैं ?


Wednesday, June 20, 2012

कई बार लोग क्या कहते हैं --
''उसका 'दिमाग' पागल हो गया है"
.... तब मैं कहता हूँ , "नहीं उसकी 'नाक' पागल हुई है"....

Tuesday, June 19, 2012

आग


इक आग धधकती है भीतर
कुछ धुआं धुआं सा उठता है
जब सामने होता अन्याय
तो रुआं रुआं सा उठता है .
---अर्पित अनाम

Monday, June 18, 2012

हमारा किसी पर हंसना हमारी अज्ञानता का प्रतीक होता है . ---अर्पित अनाम
निस्वार्थ व्यवहार का नाम मित्रता है .
--अर्पित अनाम

हे प्रभु, मुझे विप्तियाँ प्रदान कर, जिनसे संघर्ष कर मैं अनुभव प्राप्त कर सकूं .
-अर्पित अनाम

Saturday, June 16, 2012

किसी भी व्यक्ति की आत्मा गलत कार्य करने की अनुमति नहीं देती.
----अर्पित अनाम

अन्ना का थप्पड़

अन्ना का थप्पड़ किस-किस को पड़ेगा ?
भ्रष्टाचार हिन्दोस्तान की नस-नस में फ़ैल चुका है .

व्यवहार


जिससे अपने लिए जैसे व्यवहार की इच्छा हो उससे वैसा ही व्यवहार करो !
----अर्पित अनाम

Friday, June 15, 2012


बिन किये कर्म अच्छे, नहीं उद्दार होगा
अटके दुष्कर्म से बेड़ा, नेक से पार होगा
-----अर्पित अनाम

Thursday, June 14, 2012

आग धधकती है

सब कुछ सह सकता हूँ मैं, अन्याय मुझे स्वीकार नहीं 
इसलिए तो आग धधकती है, मैं झूठ का पहरेदार नहीं 
----अर्पित अनाम
जीने भी नहीं देते हैं मरने भी नहीं देते 
यारब तेरी दुनिया के ये लोग किस तरह के 
----अर्पित अनाम

चुप रहना ही है भला जब तक मन निष्प्राण
कहने को तो बहुत कुछ दिल में हैं अरमान
----अर्पित अनाम

Tuesday, June 12, 2012

आधे मूर्ख


मेरे एक मित्र हैं रायपुर के श्री रोशन लाल अग्रवाल जी.
एक बार एक सभा में उन्होंने कह दिया- "यहाँ आधे लोग मूर्ख हैं".
सभा में हंगामा हो गया.  उन पर अपने शब्द वापिस लेने का दबाव बनाया गया.
आखिर उन्होंने अपने शब्द वापिस लेते हुए कहा- "यहाँ आधे लोग मूर्ख नहीं हैं".

Saturday, June 9, 2012

हैवानियत से इस जहां में अनजान कोई न मिला 
खोजने तो थे फरिश्ते, इंसान कोई न मिला 
आश्रमों में मिल जाएं आडम्बर ओढ़े बहुतेरे
रावण ओ' कंसों को मरे भगवान कोई न मिला 
शेर घूमता रहा शिकारियों की खोज में 
मरने को बेचैन था मचान कोई न मिला
उमड़ते रहते हैं यूँ टूटे हृदय में हर वक्त
टकराए जो आहों से तूफान कोई न मिला
ज़ख्मी ये सीना पड़ा है तीर भी अब पास हैं
छोड़ दें हम भी मगर कमान कोई न मिला
अज़ब ये दुनिया हुई है अज़ब इसकी दास्तां
हैं सहज सब ही यहां हैरान कोई न मिला
---------------अर्पित अनाम---------------

Tuesday, June 5, 2012

मानवों से आज मानव हो रहा बेहाल है 


भूल मानव धर्म अपना दुष्ट चलता चाल है 


कुछ व्यवस्था ही बनी ऐसी कि हैं भयभीत सब 


रक्षकों का यूँ तो कहने को बिछा इक जाल है 


यूँ अकड़ कर चल रहे मनो खुदा हैं बस वही 


हैं भली टांगें मगर टेढ़ी ही टेढ़ी चाल है


बेबसी का घोंट कर दम खून सारा पी लिया


पेट काटे जो पराये आज वह प्रतिपाल है


साथ देने की सदा सुनकर तो आए वह मगर


सुर में सुर कैसे मिले जो बेसुरी सी ताल है


शक भी कोई क्या करे 'अर्पित' भी अर्पित हो गया


एक दाना ही नहीं काली ही सारी दाल है .


--------------अर्पित अनाम----------

Friday, June 1, 2012

फूट डालो और राज करो की नीति का सर्वाधिक उपयोग औरतें करती हैं .

नेक कर्म

कर्म करले नेक फिर बीता न कोई पल मिले 


होगा जैसा कर्म जिसका वैसा उसको फल मिले 


दुश्चरित्रों की भी सह लो है इसी में उच्चता


बल न सहने का यदि तो घुन-घृणा को बल मिले


रास यदि आई न दुनिया तो रुदन यह किसलिए 


हर समस्या का यहाँ संघर्ष ही से हल मिले


आग लग जाने पे खोदा भी तो क्या खोदा कुआं


बात तो तब है शमन को आग के जब जल मिले


लाख गहराई में ढूंढो श्रम है वो सारा वृथा


हाथ मोती क्या लगे जब तक न जल का तल मिले


जीत सकते हो हृदय 'अर्पित' सरल व्यवहार से


बात अचरज की नहीं जो छल के बदले छल मिले


--अर्पित अनाम


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