Tuesday, August 7, 2012

क्या लोक संसद ही व्यवस्था परिवर्तन है ? -- बजरंग मुनि

क्या लोक संसद ही व्यवस्था परिवर्तन है ?                                                            ------ बजरंग मुनि 

              आज भी भारत में बहुत लोग ऐसे हैं जो रामराज्य के समर्थक हैं। गांधी जी भी रामराज्य को आदर्श स्थिति मानते थे। रामराज्य का अर्थ है सुराज्य अर्थात अच्छे व्यक्ति का शासन। प्रश्न उठता है कि राम के काल में सुशासन था तो रावण का कुशासन भी तो राम के ही कालखण्ड में था। तो क्या उस समय सुशासन या कुशासन राजा की इच्छा पर निर्भर करता था तथा जनता की उसमें कोई भूमिका नहीं थी? क्या राजा पूर्ण तानाशाह था? और यदि वास्तव मे राम के काल मे ऐसा ही था तो हमे ऐसा राम राज्य नही चाहिये। चाहे ऐसे रामराज्य की प्रशंसा गांधी करे या अन्ना हजारे।
              व्यवस्था तीन प्रकार की होती है (1) राजतंत्र या तानाशाही (2) लोकतंत्र (3) लोक स्वराज्य। तानाशाही में शासन का संविधान होता है। लोकतंत्र में संविधान का शासन होता है किन्तु संविधान निर्माण में लोक और तंत्र की मिली जुली भूमिका होती है। लोक स्वराज्य में लोक द्वारा निर्मित संविधान का शासन होता है। पश्चिम के देशों में लोक स्वराज्य की दिशा में झुका हुआ लोकतंत्र है तो भारत आदि देशों में तानाशाही की दिशा में झुका हुआ। पश्चिम के देशों में संविधान का शासन है किन्तु संविधान निर्माण या संशोधन में लोक और तंत्र की मिली जुली भूमिका होती है। भारत में संविधान निर्माण या संशोधन में जनता की कोई भूमिका नहीं होती। तंत्र के तीन अंग होते हैं जो शासक माने जाते हैं। यही तीनों संविधान बनाते भी हैं और संशोधित भी करते हैं। संविधान निर्माण या संशोधन में लोक की कोई भूमिका नहीं होती। शासन के इन तीन अंगों में से भी संविधान लगभग संसद के ही अधीन होता है। संसद जब चाहे उसमें संशोधन कर सकती है जिसमें अन्य दो अंग यदा कदा ही दखल दे सकते हैं। जनता की तो संविधान संशोधन में कोई भूमिका कभी हो सकती ही नहीं।
              राम राज में राजा की व्यवस्था होती थी तथा लोकतंत्र में व्यवस्था के अन्तर्गत राज्य चलता है। उस समय राजा की इच्छा के विरूद्ध जनता कुछ भी नहीं कर सकती थी। अब आदर्श लोकतंत्र में जनता की इच्छा के बिना राज्य कुछ नहीं कर सकता क्योंकि उस समय राजा का संविधान था और अब संविधान के अन्तर्गत राज्य के तीनो अंग। दुर्भाग्य से भारत की जनता को संविधान बनाने वालों ने धोखा दिया। उन्होंने लगातार प्रचारित किया कि भारत में संविधान का शासन होगा। संविधान के अन्तर्गत ही संसद कार्य करेगी। किन्तु चुपके से उन्होंने संविधान में ही यह भी लिख दिया कि संविधान में संशोधन का अधिकार भी संसद को ही होगा। इस प्रकार भारतीय लोकतंत्र में संविधान का शासन न होकर शासन का संविधान हो गया जिसमें शासक एक व्यक्ति न होकर एक व्यवस्था का हुआ अर्थात जनता शासक को चुन सकती है किन्तु चुने जाने के बाद वह सर्वाधिकार सम्पन्न होगा और उस पर जनता का कोई हस्तक्षेप नहीं होगा। मेरे विचार से भारतीय संविधान मे जबतक संविधान संशोधन के अधिकार मे लोक और तंत्र की मिली जुली भूमिका का कोई प्रावधान नही होता तब तक यह संविधान हमारे देश के लिये कलंक है।
राम राज्य अच्छे राजा की अच्छी व्यवस्था थी। अच्छी व्यवस्था द्वारा अच्छा राज्य चले यह राम राज्य नहीं है। आज भी भारत के आम लोग अच्छा शासक चुनने की प्रणाली से बाहर नहीं निकल सके हैं। शासक तो कभी चाहता ही नहीं कि व्यवस्था बदले और किसी संविधान के अन्तर्गत शासन चले। शासक तो वर्तमान राजनैतिक व्यवस्था का ही गुणगान करता रहता है जबकि आदर्श स्थिति यह होगी कि व्यवस्था बदले। राम राज्य की परिकल्पना हमें वर्तमान गुलामी से कभी मुक्त नहीं होने देगी क्योंकि वर्तमान संवैधानिक व्यवस्था में संशोधन परिवर्तन के अधिकार से हम बाहर हैं। जब तक संविधान का शासन न हो तथा संविधान संशोधन में जनता की भागीदारी का प्रावधान न बने तब तक चाहे शासन किसी का हो, सत्ता बदल सकती है किन्तु व्यवस्था तो वही की वही रहेगी। यदि हम व्यवस्था परिवर्तन के किसी भी मार्ग पर आगे बढ़ना चाहते हैं तो संविधान संशोधन की वर्तमान प्रणाली में से या तो तंत्र को पूरी तरह बाहर करना होगा अथवा वर्तमान संविधान संशोधन प्रणाली में तंत्र के साथ साथ लोक की भी भूमिका का समावेश करना होगा। इसके अतिरिक्त किया जाने वाला कार्य सुराज ला सकता है, रामराज ला सकता है किन्तु कोई ऐसी संवैधानिक व्यवस्था नहीं ला सकता जो रावण राज या कुराज को रोक सके। हमने जिसे चुन दिया वह यदि राम के वेश में रावण भी हो तो हमें पांच वर्ष तक उसकी गुलामी झेलनी ही होगी क्योंकि जिसका शासन उसी का संविधान।
                     वर्तमान समय में व्यवस्था परिवर्तन के नाम पर अनेक संगठन सक्रिय हैं। अभी अभी गुजरात में केशु भाई पटेल भी व्यवस्था परिवर्तन की रट ही लगाना शुरू किये हैं यद्यपि ये व्यवस्था परिवर्तन का क ख ग घ भी नहीं समझते। फिर भी कुछ गंभीर संगठन व्यवस्था परिवर्तन के नाम से सक्रिय हैं। इनमें स्वदेशी आंदोलन, आर्थिक सहायता आंदोलन, आंदोलन बाबा रामदेव, आंदोलन अन्ना हजारे, आंदोलन लोकसंसद आदि प्रमुख हैं। ये सभी आंदोलन सीधे सीधे सत्ता संघर्श में नहीं दिखते भले ही अन्दर अन्दर किसी की सोच कुछ भी क्यों न हो। यदि हम स्वदेशी आंदोलन की समीक्षा करें तो इसमें न तो सत्ता परिवर्तन की कोई गंध आती है न ही व्यवस्था परिवर्तन की कोई दिशा दिखती है। इस आंदोलन में मुख्य रूप से सर्व सेवा संघ तथा राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के लोग सक्रिय हैं। लेकिन इनका आंदोलन आप लिखें खुदा बांचे की तर्ज पर निरंतर जारी है। स्वदेशी का अर्थ स्थानीय होगा या भारतीय यह भी ये लोग स्पष्ट नहीं कर सके हैं। लगता है कि विदेशी उद्योगपतियों के विरूद्ध भारतीय उद्योगपतियों के मोर्चे से ज्यादा इस आंदोलन की कोई भी भूमिका नहीं है। इसका न भारत की राजनैतिक व्यवस्था के विषय में कोई गंभीर सोच है न सामाजिक व्यवस्था के विषय में । भारत के राजनैतिक व्यवस्था पूरी खुशामद करके विश्व बाजार को आमंत्रित कर रही है और ये लोग उन वस्तुओं के सामाजिक बहिष्कार की बात समझाने में ही लगे हुए हैं। व्यवस्था परिवर्तन के नाम से एक ऐसा समूह भी सक्रिय है जो आम नागरिकों की आर्थिक अवस्था परिवर्तन को ही व्यवस्था परिवर्तन मानता है। ऐसे संगठनों में भरत गांधी जी, रोशन लाल जी, प्रमोद कुमार वात्सल्य जी आदि अलग अलग समूहों में सक्रिय हैं। ये लोग सत्ता में आने के बाद समाज के लोगों को प्रति व्यक्ति सत्रह सौ से दस हजार रूपया मासिक गुजारा भत्ता देने की घोषणा करते हैं। हम भी यह तो चाहते हैं कि वर्तमान में दी जा रही सब्सीडी एक मुफ्त तथा नगद रूपये के रूप में हो, ऐसी सब्सीडी के लिये कृत्रिम उर्जा पर भारी कर लगाये जायें, ग्रामीण गरीब श्रमजीवी उत्पादन उपभोग की वस्तुओं पर लगने वाले सभी कर समाप्त हों। हम यह भी चाहते हैं कि स्वतंत्र अर्थपालिका हो जिससे राजनेता अर्थ व्यवस्था को राजनैतिक हथियार के रूप में उपयोग न कर सकें किन्तु इन सब आर्थिक विचारों से दूर सिर्फ पैसा बांटने की मांग सिर्फ सत्ता परिवर्तन के प्रयास तक सीमित लगती है। इसका व्यवस्था परिवर्तन से संबंध नहीं दिखता।
                      व्यवस्था परिवर्तन के नाम से बाबा रामदेव भी बहुत दौड़ धूप कर रहे हैं। इनका कथन है कि हम सत्ता में आयेंगे तो विदेशों में छिपा कर रखा गया काला धन भारत में वापस ले आयेंगे। इस धन से भारत के आम लोगों की आर्थिक स्थिति बहुत मजबूत हो जायेगी। मेरे विचार में न तो रामदेव जी की मांग में कोई दम है न ही आंदोलन में। आर्थिक समाधान अवस्था परिवर्तन ही कर सकते हैं व्यवस्था परिवर्तन नहीं। विदेशों से काला धन भारत आ जायगा तो भारत में चोरी, डकैती, बलात्कार, मिलावट, चरित्र पतन, भ्रष्टाचार, साम्प्रदायिकता, जातिवाद, श्रमशोषण जैसी समस्याओं पर कोई प्रभाव नहीं पड़ सकता। इतना अवश्य होगा कि इस आंदोलन से बाबा जी के पास जमा कुछ धन समाज के पास आ जायगा।
                        व्यवस्था परिवर्तन के लिये एक और गंभीर प्रयास अन्ना जी की टीम का है। यह टीम लोकपाल का आंदोलन कर रही है। लोकपाल कानून बन जाने से राजनैतिक भ्रष्टाचार में कुछ कमी आना संभव है किन्तु यह भी किसी भी रूप में व्यवस्था परिवर्तन नहीं है। भ्रष्टाचार राजनैतिक शक्ति के केन्द्रीयकरण का परिणाम है, कारण नहीं। पहली बात तो यह है कि सत्ता के अकेन्द्रीयकरण के बिना भ्रष्टाचार पर अंकुश लग ही नहीं सकता। यदि लग भी गया तो सुराज आ सकता है किन्तु लोक और तंत्र के बीच दूरी घटेगी नहीं। समाज आज की तरह गुलाम का गुलाम ही रहेगा। भ्रष्टाचार नियंत्रण भी व्यवस्था परिवर्तन नहीं है।
                       मेरे विचार में व्यवस्था परिवर्तन की एक ही पहचान है और वह है सहभागी लोकतंत्र। परिवार, गांव, जिले को विधायी अधिकार देने का प्रयास ही व्यवस्था परिवर्तन है। प्रसिद्ध गांधीवादी ठाकुर दास जी बंग ने लम्बे समय तक इसके लिये देश भर में जनमत जागरण किया। आज भी सिद्धार्थ शर्मा बेंगलूर, एम एच पाटिल बेंगलूर, छबील सिंह सिसोदिया गाजियाबाद सरीखे अल्प विख्यात चेहरे लोक स्वराज्य मंच के नाम से इस मशाल को प्रज्वलित कर रहे हैं। यही एकमात्र कार्य है व्यवस्था परिवर्तन। जब तक परिवार व्यवस्था गांव व्यवस्था मजबूत और अधिकार सम्पन्न नहीं होती तब तक न चोरी, डकैती, बलात्कार, मिलावट की रोकथाम संभव है न भ्रष्टाचार, चरित्र पतन, साम्प्रदायिकता, जातिवाद और श्रमशोषण की। ऐसी सभी प्रमुख समस्याओं का समाधान है परिवार व्यवस्था, गांव व्यवस्था को मजबूत करना। भारत परिवारों का संघ बने। परिवार तथा गांव को विधायी अधिकार मिलें। सरकार की भूमिका मैनेजर की हो, कस्टोडियन की नहीं। यह है व्यवस्था परिवर्तन।
                    हम बार बार लोक संसद को आंदोलन का सूत्र बनाने की बात कर रहे हैं। लोक संसद आंदोलन भी स्वयं में व्यवस्था परिवर्तन न होकर व्यवस्था परिवर्तन की दिशा में उठा एक कदम मात्र होगा। लोक संसद राइट टू रिकाल द्वारा सांसदों की मनमानी पर रोक लगायेगा। लोक संसद द्वारा वर्तमान संसद के संविधान संशोधन अधिकार सीमित हो जायंगे। लोक संसद होने से वर्तमान संसद मनमानी वेतन वृद्धि नहीं कर सकेगी। लोक संसद होने से वर्तमान संसद अन्य संवैधानिक इकाइयों पर अपनी दादागिरी नहीं चला सकेंगी।
                      लोक संसद भले ही अनेक समस्याओं के समाधान का मार्ग खोलती है किन्तु व्यवस्था परिवर्तन के लिये तो हमें लोक संसद से भी आगे जाकर परिवार गांव जिले के विधायी अधिकारों की सूची संविधान मे शामिल करनी होगी। हम यदि ऐसा करने मे सफल हुए तब तो हम कुछ सीमा तक गुलामी से छुटकारा पा सकते हैं अन्यथा चुनावों का अवसर देखकर हमे गुलाम बनाकर रखने की लालच मे भिन्न भिन्न बहुरूपियें हमे अनेक प्रकार के लालच देकर समझाते रहेंगे और कोई अन्य मार्ग न देखकर हम इन्ही मे से किसी एक को वोट देकर लोकतांत्रिक गुलामी की स्वीकारोक्ति पर मुहर लगाते रहेंगे ।