Thursday, July 19, 2012

मान जाना याद है 
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तेरा अंदाज़ ऐ सनम वो कातिलाना याद है 
और रह-रह कर तिरा वो मुस्कराना याद है 
बैठना मिलजुल के तेरा, रूठ जाना फिर तिरा 
रूठ कर फिर जाने-जाना मान जाना याद है
याद आती हैं मुझे रह-रह के तेरी शोखियाँ
छेड़कर मुझको वो तेरा खिलखिलाना याद है
एकदम खामोश हूँ, तब पास मेरे बैठना
और गुमसुम होके यूँ, जी को जलाना याद है
देखना, आदाब करना, मुस्कराना, ऐ सनम
और आंचल में तिरा वो मुंह छुपाना याद है
तोडकर गुल को मसलना, फिर उठाकर फेंकना
दिल पे 'अर्पित' मुझको उनका ज़ुल्म ढाना याद है
~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~अर्पित अनाम