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कुर्बानियां देने का ठेका ही हमारे पास है हक पराया लूट लें वो इसकी उनको आस है --अर्पित अनाम
ज़हर क्यों हिस्से हमारे आ रहा है जिसने बोये कांटे अमृत पा रहा है --अर्पित अनाम
उसूल भी कभी कभी कमजोरी बन जाते हैं . --अर्पित अनाम
आह ! नीचता की सब हदें तो कर गये हैं पर वो  इससे ज़्यादा क्या गिरेंगे गर्त में वे अब अधम --अर्पित अनाम
बुराई वे करें, बदनामियाँ हिस्से मेरे आएं अच्छाई हम करें, शाबासियां वे लूट ले जाएं --अर्पित अनाम
हे भगवन यदि इन्सां बुरे तूने बनाये हैं तो मुजरिम तू भी है सच की हमारी इस अदालत का --अर्पित अनाम

सच के सहारे

सच के सहारे देर से ही सही जीत सुखदायक होगी